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वामपंथी इतिहासकारों पर महाराणा की जीत🚩🚩


एक बार फिर से यह सिद्ध हो गया है कि हल्दीघाटी के युद्ध में महाराणा प्रताप विजयी हुए थे और अकबर को हार का सामना करना पड़ा था। अकबर को ‘महान’ बनाने के लिए वामपंथी और मुस्लिम इतिहासकारों ने उसे विजेता बता कर देश के साथ धोखा किया
अपने देश के वामपंथी और मुस्लिम इतिहासकारों के कारण आज भी हल्दीघाटी के युद्ध में विजय को लेकर परस्पर विरोधी मत उभरते हैं। दरअसल, इसे बड़ी और छोटी ताकत की भिड़ंत जैसा युद्ध कहा जाता है, जबकि यह दो विचारधाराओं के बीच का संघर्ष था।  मध्यकाल में यही एक ऐसा युद्ध था, जिसमें मानसिंह को एक रणनीति के तहत इस भुलावे में रखा गया कि अभी युद्ध शेष है और वह अगले मुकाबले का इंतजार ही करता रहा। अधिकांश फारसी लेखकों एवं उनके आधार पर कुछ आधुनिक इतिहास लेखकों ने यहां महाराणा प्रताप की पराजय को स्वीकार किया है। वहीं राजस्थान के इतिहास के स्रोत महाराणा की विजय को स्वीकार करते हैं। 

इसके लिए कुछ बातों पर गौर करने की जरूरत है। हल्दी घाटी युद्ध (18 जून, 1576 ई़) के बाद 1577-78 अर्थात् वि़ सं़ 1635 आसोज सुद 5, गुरुवार को महाराणा प्रताप की ओर से जैन मत के तत्कालीन आचार्य हीरविजय सूरि को मेवाड़ में पधारने का निमंत्रण भेजा गया। यदि हल्दीघाटी युद्ध में प्रताप की पराजय होती तो क्या प्रताप के लिए हीरविजय सूरि को ऐसा पत्र लिखकर उन्हें बुलाना संभव होता? हल्दीघाटी युद्ध के लगभग 152 वर्ष पश्चात् वैशाख पूर्णिमा वि़ सं़ 1709 में महाराणा जगतसिंह प्रथम (1628-52ई़) ने जगन्नाथराय मंदिर (उदयपुर के राजमहल के बाहर वर्तमान जगदीश मंदिर) बनवाया। इस मंदिर के सभा-मण्डप में एक प्रशस्ति लगी हुई है। इस प्रशस्ति के श्लोक सं़ 41 में स्पष्ट रूप से प्रताप की हल्दीघाटी युद्ध में विजय होने का उल्लेख है। इसी तरह राजस्थानी भाषा के महाकाव्य दयालदास कृत ‘राणा रासो’ (रचनाकाल वि़ सं 1675) में भी हल्दीघाटी युद्ध में महाराणा प्रताप की विजय उल्लिखित है। इसके बावजूद कुछ इतिहासकार महाराणा प्रताप की हार की बात करते हैं। इन्होंने ऐसा क्यों किया है, इसे समझने की जरूरत है। इसे उद्देश्यगत, क्रियागत एवं परिदृश्यगत, तीनों रूपों में देखना होगा। 
#उद्देश्यगत_परिणाम 
जैसा कि स्पष्ट है कि अकबर का उद्देश्य महाराणा प्रताप को जीवित पकड़कर मुगल दरबार में अधीनस्थ के रूप में खड़ा करना था अथवा मार देना था। कुल मिलाकर प्रताप के स्वाभिमानी जीवन एवं स्वातंत्र्य प्रेम को धूल-धूसरित करना था या फिर उनके भौतिक अस्तित्व को मिटाकर अपने साम्राज्यवाद का डंका बजाना था। लेकिन हम देखते हैं कि अकबर के ये दोनों ही उद्देश्य पूरे नहीं हुए। हल्दीघाटी युद्ध में प्रताप के जीवित बच जाने तथा विशाल मुगल सेना से कड़ा मुकाबला करने के कारण उनका स्वातंत्र्य प्रेम और भी परवान चढ़ा। वहीं दूसरी ओर मुगल सेना के हौसले तो इतने पस्त हो गए कि सैनिक प्रताप का पीछा भी नहीं कर पाए एवं डरते-डरते हल्दीघाटी की घाटियों से निकलकर गोगुन्दा पहुंचे। वहां पर भी वे भयाक्रांत ही बने रहे। अत: समीक्षा के प्रथम आधार पर अकबर को विजेता सिद्ध नहीं किया जा सकता।
 
  #प्रताप_की_विजय_के_प्रमाण
हल्दीघाटी युद्ध के बाद 1577-78 में महाराणा प्रताप की ओर से जैन मत के तत्कालीन आचार्य हीरविजय सूरि को मेवाड़ आने का निमंत्रण भेजा गया। यदि हल्दीघाटी युद्ध में प्रताप की पराजय होती तो क्या वे ऐसा कर पाते?
1709 में महाराणा जगतसिंह प्रथम ने जगन्नाथराय मंदिर (उदयपुर के राजमहल के बाहर वर्तमान जगदीश मंदिर) बनवाया। इस मंदिर के श्लोक सं़ 41 में स्पष्ट रूप से प्रताप की हल्दीघाटी युद्ध में विजय होने का उल्लेख है।
राजस्थानी भाषा के महाकाव्य दयालदास कृत ‘राणा रासो’ (रचनाकाल वि़ सं 1675) में भी हल्दीघाटी के युद्ध में महाराणा प्रताप की विजय उल्लिखित है।

#हटाई_गइं_विवादास्पद_पट्टिकाएं

गत दिनों हल्दी घाटी में लगाई गर्इं कुछ विवादास्पद पट्टिकाएं हटा दी गई हैं। उन पर यह लिखा हुआ था कि हल्दीघाटी के युद्ध में महाराणा प्रताप भाग खड़े हुए थे यानी अकबर की विजय हुई थी। इसका अनेक संगठन विरोध कर रहे थे। इसके बाद राजसमंद की सांसद दीया कुमारी, विधायक दीप्ति माहेश्वरी और कुछ राजपूत संगठनों ने केंद्रीय संस्कृति मंत्रालय को इस संबंध में पत्र लिखा था। इसके बाद केंद्रीय संस्कृति राज्यमंत्री अर्जुनराम मेघवाल ने भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) को कार्रवाई करने को कहा था।

#क्रियागत_परिणाम
सैन्य दृष्टि से संख्याबल में कम होते हुए भी प्रताप द्वारा आक्रमण की पहल करना और आक्रमण के प्रथम चरण में मुगल सेना को शिकस्त देना इस युद्ध का बहुत ही विचित्र किन्तु श्रव्य और उज्जवल पक्ष है। युद्ध पद्धति के छापामार स्वरूप को समझते हुए यह निर्णय कदापि नहीं निकाला जा सकता कि मुगल सेना को विजय मिली थी। छापामार युद्ध की प्रकृति यही है कि उसका सीमांकन किसी क्षेत्र एवं अवधि के दायरे में नहीं किया जा सकता, यह तो सतत् युद्ध की झड़पों को प्रदर्शित करने वाला युद्ध हुआ करता है जिसका लक्ष्य प्राणाहुति न होकर प्राण रक्षा के साथ युद्ध की निरन्तरता को बनाए रखने एवं दुश्मन की चालों को मात देने के प्रयास करना होता है। इसमें युद्ध की सन्नद्धता एवं पलायन का बराबर ही महत्व होता है, क्योंकि दोनों ही युद्ध पद्धति के अंग हुआ करते हैं। मुगल सेनापति मानसिंह का हाथी के हौदे में छिपकर अपनी प्राण रक्षा करना, वार कर रहे प्रताप का सामना नहीं कर पाना क्या सिद्ध करता है? अत: इस आधार पर भी अकबर की विजय अथवा प्रताप की पराजय को कैसे स्वीकार किया जा सकता है? क्रियागत आधार पर भी यह सिद्ध है कि इस युद्ध में प्रताप का ही पलड़ा भारी रहा था। गोगुन्दा की ओर बढ़ती मुगल सेना को कदम-कदम पर आशंका थी कि राणा कहीं पहाड़ों के पीछे से आ न जाएं। 
#परिदृश्यगत_परिणाम
मानसिंह का गोगुन्दा में डेरा डालकर पड़े रहना, अकबर द्वारा बुलाने पर मुगल दरबार में जाना, अकबर का नाराज होकर ड्योढ़ी बन्द करना, हल्दीघाटी के बाद अकबर के अन्य किसी भी सैन्य अभियान का नेतृत्व मानसिंह को नहीं मिलना, हल्दीघाटी क्षेत्र एवं गोगुन्दा क्षेत्र पर मुगलों का अधिकार नहीं रह पाना, मेवाड़ क्षेत्र से डरते-डरते मुगल सेना की वापसी, पहाड़ियों से घिरे क्षेत्र में घात-प्रतिघात की आशंका से भयभीत मुगल सेना की मन:स्थिति, हल्दी घाटी के बाद भी मेवाड़ की प्रजा का प्रताप को सतत् संघर्षशील किंतु क्रियात्मक सहयोग एवं समर्थन, युद्ध के बाद प्रताप का बढ़ा हुआ मनोबल एवं मुगल ठिकानों पर आक्रमण एवं अधिकार, जनमानस का प्रताप को अजेय ही मानना, मुगलों की जीत के समाचार के प्रति संदेह और अविश्वास ये ऐसे परिदृश्य हैं, जिनके आधार पर अकबर को अथवा मुगल सेना के अभियान को सफल सिद्ध करना युक्तिसंगत प्रतीत नहीं होता। समग्र दृष्टि से विवेचन ही इतिहास का ध्येय होते है। अत: यह कहना उचित ही होगा कि अकबर उद्देश्यगत परिणाम में पराजित हुआ था, वहीं प्रताप विजयी। क्रियागत आधार पर भी मानसिंह को विजयी नहीं ठहराया जा सकता। परिदृश्यगत परिणाम प्रताप की विजय को सिद्ध करता है। जैसा कि कुछ फारसी लेखकों ने भी प्रताप की जीत को स्वीकार किया है। उद्देश्यगत, क्रियागत एवं परिदृश्यगत आधार पर प्रताप की विजय ही मालूम होती है। अत: ठोस निष्कर्ष के रूप में स्वीकार किया गया कि प्रताप विजेता थे, पलायनवादी नहीं। 
(लेखक राजकीय मीरा कन्या महाविद्यालय, उदयपुर में इतिहास विभाग में सह-आचार्य हैं)

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